साहित्यिक · 22 मार्च 2013
चिन्तन के गीत
“कहने को तो हम आवारा स्वर हैं,
इस वक्त सुबह के आमंत्रण पर हैं,
हम ले आए हैं बीज उजाले में,
पहचानो! सूरज के हस्ताक्षर हैं।”
डा. हरिवंशराय बच्चन से चौथी पीढ़ी के साधक गीत-कवि श्री ‘रजनीश’ जी के गीतों को मैं विगत लगभग चार दशकों से सुन-पढ़ रहा हूँ। हिन्दी गीत जब अपने धरातल पर निर्मित हो रहा था, तब अपनी भावभूमि पर सहचरी भाषाओं की रसवंतता की स्वीकृति के साथ हिन्दी गीत को समृद्ध करने का जो भगीरथ प्रयास उन्होंने आरंभ किया, उसे वे आज तक निरंतर करते आ रहे हैं।
‘रजनीश’ जी गीतकारों-ग़ज़लकारों की भीड़ में अल्पसंख्यक हैं, लेकिन अपनी पहचान बिल्कुल अलग बनाए हुए हैं। उनके रसवंत गीत चिंतन की मृगछाला पर आसीन हैं।
गीतों को आप पढ़िए तो वे बरबस आपके अधरों पर चढ़ने की कोशिश करते दिखाई देंगे। आगामी गीत-संग्रह के गीतों को मैंने पढ़ा। पढ़ने के उपरांत रचनाओं ने मुझे सस्वर पाठ करने पर विवश कर दिया। ‘रजनीश’ जी के गीत सुधी पाठकों के हृदय-सिंहासन पर विराजेंगे। हिन्दी साहित्य ऐसे गीतों से धन्य होगा।
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“कहने को तो हम आवारा स्वर हैं, इस वक्त सुबह के आमंत्रण पर हैं, हम ले आए हैं बीज उजाले में, पहचानो! सूरज के हस्ताक्षर हैं।” डा. हरिवंशराय बच्चन से चौथी पीढ़ी के साधक गीत-कवि श्री ‘रजनीश’ जी के गीतों को मैं विगत लगभग चार दशकों से सुन-पढ़ रहा हूँ। हिन्दी गीत जब अपने धरातल पर निर्मित हो रहा था, तब अपनी भावभूमि पर सहचरी भाषाओं की रसवंतता की स्वीकृति के साथ हिन्दी गीत को समृद्ध करने का जो भगीरथ प्रयास उन्होंने आरंभ किया, उसे वे आज तक निरंतर करते आ रहे हैं। ‘रजनीश’ जी गीतकारों-ग़ज़लकारों की भीड़ में अल्पसंख्यक हैं, लेकिन अपनी पहचान बिल्कुल अलग बनाए हुए हैं। उनके रसवंत गीत चिंतन की मृगछाला पर आसीन हैं। गीतों को आप पढ़िए तो वे बरबस आपके अधरों पर चढ़ने की कोशिश करते दिखाई देंगे। आगामी गीत-संग्रह के गीतों को मैंने पढ़ा। पढ़ने के उपरांत रचनाओं ने मुझे सस्वर पाठ करने पर विवश कर दिया। ‘रजनीश’ जी के गीत सुधी पाठकों के हृदय-सिंहासन पर विराजेंगे। हिन्दी साहित्य ऐसे गीतों से धन्य होगा।
— सोम ठाकुर

