आम राह पर चलने वाले
बांकेलाल श्रीवास्तव “रजनीश”
2013 · तरुवर की छांव · रजनीश
आम राह पर चलने वाले,
आम नहीं होते।
बुझने वाले दीपों के,
आयाम नहीं होते।
स्वर ने शब्दों को जिस दिन अनुराग दिया होगा,
मनु ने सतरूपा को उस दिन प्यार किया होगा,
अनुकम्पा से प्रभुता जिस दिन हार गई होगी,
गौतम ने सिंहासन उस दिन त्याग दिया होगा,
भरद्वाज ने ऋषियों को,
यह समझाया होगा।
भाषण वाली शैली में,
पैगाम नहीं होते।
आम राह पर चलने वाले,
आम नहीं होते।
जिस दिन पतझर के ऊपर विश्वास हुआ होगा,
मधुबन के पहले उस दिन मधुमास हुआ होगा,
हर रघुवंशी को उस दिन अहसास हुआ होगा,
गर्भवती सीता को जिस दिन वनवास हुआ होगा,
वाल्मीकि ने रामायण में, यही कहा होगा।
सिंहासन के लोभी,
सीताराम नहीं होते।
आम राह पर चलने वाले,
आम नहीं होते।
पांचाली के पांचों पति जब मौन हुए होंगे,
सिवा तुम्हारे सबके सब प्रतिकूल हुए होंगे,
नाबालिग आशा उस दिन निर्मूल हुई होगी,
आदि पुरुष से उस दिन भूल हुई होगी,
सूरदास ने गली-गली में,
यह पद गाया होगा।
नाटक करने वाले,
राधेश्याम नही होते।
आम राह पर चलने वाले,
आम नहीं होते।
अमृत पीने वालों ने निष्काम जिया होगा,
विष पीने वालों ने सबका भला किया होगा,
किंतु हमारी और तुम्हारी खातिर जो जीते,
उन लोगों ने सहज भाव आग पिया होगा,
प्रण, प्रताप, संकल्प, सिद्धि,
सिद्धांत यही कहते।
दीवानों के दर्द कभी,
नीलाम नहीं होते।
आम राह पर चलने वाले,
आम नहीं होते।
स्रोत: तरुवर की छांव
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अद्यतन: 5 अक्टूबर 2026
